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जम्मू-कश्मीर की गुज्जर-बकरवाल जनजाति | Gujjar Bakarwal Tribe in Hindi

इस लेख में जम्मू-कश्मीर की गुज्जर-बकरवाल जनजाति (Gujjar Bakarwal Tribe in Hindi) के बारे में पूरी जानकारी दी गयी हैं। 

Gujjar Bakarwal Tribe in Hindi


गुज्जर और बकरवाल जनजाति का निवास क्षेत्र - Gujjar Bakarwal Tribe in Hindi

गुज्जर और बकरवाल भेड़-बकरियां पालने वाला एक ऋतु प्रवासी समूह हैं जो अपने रेवड़ों के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य की ऊँची-नीची चोटियों के बीच विचरण करते हैं। इस जनजाति का निवास क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी हिमालय का पहाड़ी भूभाग है। यह जनजाति उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में भी पाई जाती हैं। 


अर्थव्यवस्था और समाज - Gujjar Bakarwal Tribe Economy and Socity in Hindi

गुज्जर-बकरवाल लोगों ने अपने आप को तीन प्रमुख रिश्तेदारी समूहों में विभाजित कर रखा हैं -

  1. डेरा (परिवार)
  2. वंश 
  3. गोत्र 

1. डेरा 

डेरा, गुज्जर-बकरवालों में सामाजिक संरचना की मुख्य इकाई होती है। एक व्यक्ति विवाहित होने के बाद अपनी स्वतंत्र गृहस्थी स्थापित करता है, तब डेरा अस्तित्व में आता है। एक डेरा प्रायः 5-6 सदस्यों का होता हैं। 


डेरे के प्रत्येक सदस्यों में लिंग और आयु के आधार पर श्रम का बंटवारा होता हैं। स्त्रियां खाना बनाने, कपड़े धोने, पानी भरने, लकड़ी इकट्ठा करने, कताई व बुनाई आदि कार्य करती हैं वहीं पुरुष पशुओं को चराने, घास, जड़ी-बूटियां एकत्रित करना, कस्तूरी प्राप्त करना, आखेट करना, हल चलना, फसल तैयार करना जैसे कठिन कार्य करते हैं। 


2. वंश 

कई ढेरों को मिलाकर एक वंश बनता है। एक वंश परंपरा में लगभग 200 व्यक्ति शामिल होते हैं। एक वंश में कई पीढ़ियां सम्मिलित रहती हैं जिसमें दूर के सम्बन्धी और भाई-भतीजे भी शामिल रहते हैं। प्रत्येक वंश का एक मुखिया होता है जो अपने पूरे समूह के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक क्रियाकलापों के लिए उत्तरदायी होता है। मुखिया द्वारा ही समूह के सामाजिक-राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं और पूरे समूह को इन निर्णय को अविवाद्य रूप से मानना होता है। 


3. गोत्र 

गुज्जर-बकरवाल समुदाय, कई गोत्रों में विभाजित रहता है। एक कुल के सदस्य एक ही पूर्वज के वंशज होते हैं। इनकी गोत्र व्यवस्था हिन्दू गुज्जरों से ली गयी है। 


पशुचारण 

गुज्जर-बकरवालों का मुख्य आर्थिक कार्य पशुचारण है। पशुचारकों के रेवड़ का आकार पशुचारकों की इकाई का आकार निश्चित करता है। यदि रेवड़ का आकार बड़ा हो जाता है तो वह चराई की कुशलता और रेवड़ के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ऐसी दशाओं में कुछ डेरे पशुचारक इकाई से अलग हो जाना पसंद करते हैं और जब रेवड़ का आकार काफी छोटा हो जाता है तब यह अपनी मूल पशुचारक इकाई में मिल जाते हैं। 


चरागाह और ऋतु प्रवास 

गुज्जर-बकरवाल लोगों द्वारा उपयोग में लिए जाने वाले प्राकृतिक चारागाह मौसमी होते हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य में गुज्जर-बकरवाल लोगों द्वारा वर्षभर चराई के काम में लिए जाने वाले चरागाह को तीन भागों में विभाजित किया जाता है -

  1. शीतकालीन चरागाह 
  2. मध्यवर्ती चरागाह अथवा मध्य पर्वतीय चरागाह 
  3. ग्रीष्मकालीन चरागाह जिन्हें यहाँ मारगस अथवा ढोक कहा जाता है। 

गुज्जर-बकरवाल लोगों की पशुचारक अर्थव्यवस्था विस्तृत मौसमी चरागाहों की उपलब्धि और उनके उपयोग पर निर्भर है। ये लोग पशुओं को सर्दी के मौसम में सामान्यतः पहाड़ी स्थानों से घाटियों के चरागाहों पर और गर्मियों में पुनः पहाड़ी स्थानों पर ले जाते हैं। 


जिरगा क्या है?

जिरगा, गुज्जर-बकरवालों की एक पंचायत है जो सदस्यों के आपसी झगड़ों को सुलझाती है। 


धर्म 

धर्म से गुज्जर-बकरवाल लोग इस्लाम के अनुयायी है। क्योंकि गुज्जर-बकरवाल वर्ष के अधिकांश समय में विचरण करते रहते हैं, इसलिए उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं प्रवसन से अधिक प्रभावित है। 


गुज्जर बकरवाल लोगों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक क्रियाओं और उत्सवों में पांच समय की नमाज, रमजान के महीने में रोजा रखना, ईद-उल-फितर, इदुल-जुहा, नवरोज और बैसाखी मुख्य हैं। विवाह इस्लाम के रीति-रिवाजों द्वारा होता हैं। 


गुज्जर-बकरवाल इस्लामी प्रथा के अनुसार अपने मृत व्यक्ति को दफन करते है। यदि प्रवास करते समय किसी की मृत्यु हो जाती है तो मृत व्यक्ति को मार्ग के सहारे ही किसी स्थान पर दफन कर दिया जाता है। ये लोग उस व्यक्ति की कब्र पर पहचान के लिए पत्थरों का एक ढेर एकत्रित कर देते हैं और प्रत्येक वर्ष जब वे इस स्थान से होकर गुजरते हैं तब उस दिवंगत आत्मा के प्रति दीपक जलाकर आदर व्यक्त करते है। 


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