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उपनिवेशवाद का तीसरा चरण [वित्तीय चरण (1858 के पश्चात)] क्या था? | आधुनिक भारत इतिहास

आधुनिक भारत के इतिहास के लेखों में अभी तक हमने Upniveshvad Kise Kahate Hain?, उपनिवेशवाद के कौन-कौन से चरण होते है?, उपनिवेशवाद के पहले चरण (वाणिज्यिक चरण) तथा दूसरे चरण (औधोगिक चरण) के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की है। इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम इस लेख में उपनिवेशवाद के तीसरे चरण अर्थात वित्तीय चरण के बारे में जानेंगे। हम जानेंगे की किस प्रकार अंग्रेजों ने ब्रिटेन में उभरने वाली जरूरतों के हिसाब से भारत में अपनी नीतियों को बदला और इन नीतियों में बदलाव से भारतीय समाज पर क्या प्रभाव हुआ?


Upniveshvad Kise Kahate Hain


Table of Content



उपनिवेशवाद का तीसरा चरण: वित्तीय चरण (1858 के पश्चात) - Third Phase of Colonialism in Hindi

वित्तीय चरण के 2 मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे -

1. भारत को ब्रिटिश पूँजी निवेश के लिए खोलना 

पूंजीवाद के वित्तीय चरण में बड़ी मात्रा में पूंजी का संचय हुआ। इसलिए अब उन्हें अपनी वस्तुओं के लिए ही बाजार नहीं बल्कि अपनी पूंजी के निवेश के लिए भी बाजार चाहिए था। ऐसी स्थिति में उपनिवेश में पूंजी निवेश करना अपने आप में फायदेमंद रहता, क्योंकि यहां श्रम सस्ता था इसलिए पूंजी पर मुनाफा अधिक मिलता। अतः इस काल में बड़ी मात्रा में ब्रिटेन से पूंजी आई तथा कर्ज एवं निवेश के रूप में लगी यथा रेलवे निर्माण, कर्ज एवं सरकारी कर्ज तथा दूसरी ओर चाय बागान, कॉफी बागान, खनन क्षेत्र और जहाजरानी उद्योग आदि में निवेश के रूप में। कर्ज की राशि पर उन्हें ब्याज प्राप्त होता, जबकि निवेश की राशि पर उन्हें मुनाफा प्राप्त होता। इसके अतिरिक्त चाय, कॉफी और खनिज जैसे उत्पादों पर भी उनका नियंत्रण बना रहता। 


2. 1857 के महाविद्रोह जैसी घटना की पुनरावर्ती को रोकना। 



वित्तीय चरण की राजनीतिक नीतियां 

1. 1857 के महाविद्रोह से ब्रिटिश ने सबक लिया और अपनी राजनीतिक नीतियों में परिवर्तन किया। ऐसा देखा गया था कि यह विद्रोह प्रत्यक्ष नियंत्रण वाले क्षेत्रों में घटित हुआ था। इसलिए ब्रिटिश ने अब भारत में प्रत्यक्ष नियंत्रण की जगह अप्रत्यक्ष नियंत्रण की नीति अपनाई। 


2. वायसराय लिटन 1876 में 'राजकीय उपाधि अधिनियम' लाया और इसके तहत महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी की उपाधि मिली। इसका एक स्वाभाविक यह फायदा था कि अब ब्रिटिश क्राउन बाह्य तत्व से आंतरिक तत्व बन गई। अब ब्रिटिश क्राउन मुगल सम्राट की तरह कई प्रकार की राजकीय औपचारिकताओं का पालन करने लगी ताकि जन-सामान्य भारतीयों के बीच उसका प्रभाव बना रहे। 1877 में दिल्ली दरबार का आयोजन हुआ जिसमें भारतीय शासक महारानी विक्टोरिया के समक्ष सामंतों की तरह उपस्थित हुए। 


3. 1857 के महाविद्रोह से सबक लेकर एक नई नीति की शुरुआत की वह यह है कि भारतीय शासक जन-सामान्य भारतीयों के स्वाभाविक नेता थे। अतः उनके माध्यम से उनकी प्रजा पर भी प्रभाव बना रहना था, इसलिए भी भारतीय शासकों के साथ सहयोग की नीति अपनाई गई। 


4. इस काल में रेलवे और टेलीग्राफ का विकास हो रहा था तो देसी राज्यों से भी अपेक्षा की कि वे रेलवे और टेलीग्राफ की लाइनों को अपने यहां से गुजरने दें। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में आधुनिक यातायात और संचार व्यवस्था के माध्यम से भारतीय राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ बांध दिया। 


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वित्तीय चरण की प्रशासनिक नीतियां 

प्रशासनिक संरचना में इस प्रकार के सुधार एवं परिवर्तन किये जिससे की 1857 जैसे महाविद्रोह की पुनरावृत्ति ना हो। वित्तीय चरण में किये गए प्रशासनिक परिवर्तन निम्नलिखित थे -

1. कंपनी के शासन की समाप्ति 

भारत में ब्रिटिश कंपनी का अंत कर दिया गया तथा भारत का प्रशासन प्रत्यक्ष रूप में ब्रिटिश क्राउन ने अपने हाथों में ले लिया। भारत के प्रशासन के लिए लंदन में भारत सचिव (Secretary of State) के पद का सृजन किया गया तथा उसकी मदद के लिए एक 15 सदस्य काउंसिल का गठन किया गया। 


2. गवर्नर जनरल से वायसराय 

भारत में गवर्नर जनरल का पद पूर्ववत बना रहा परंतु उसके पद का नाम बदलकर वायसराय कर दिया गया। प्रांतों में गवर्नर का पद पूर्ववत ही बना रहा। 


3. सिविल सेवा में सुधार 

भारत में उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए 'Covenant Civil Service' का प्रावधान था। किंतु यह सिविल सेवा लगभग अंग्रेजों के लिए सुरक्षित थी। वहीं कनिष्ठ सेवा (Uncovenanted Civil Service) में भारतीयों को प्रवेश दिया जाता था। किंतु 1857 के महाविद्रोह के बाद कुलीन भारतीयों को भारत में उच्च पदों पर नियुक्ति के मुद्दे पर विचार किया गया और फिर एक Statutory Civil Service का सृजन किया गया। 


4. सैन्य एवं पुलिस सुधार

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की एक महत्वपूर्ण स्तंभ थी - सेना। फिर 1857 के महाविद्रोह में सैनिक विद्रोह जैसी घटना से सबक लेकर सुधार के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए - 

  • सैनिक क्षेत्र में भारतीय एवं यूरोपीय तत्वों के बीच बेहतर संतुलन लाना। 
  • उत्तरी बिहार एवं पूर्वी संयुक्त प्रांत जैसे राजनीतिक रूप से सजग क्षेत्रों से सैन्य नियुक्ति की हतोत्साहित किया गया।  एक लड़ाकू जाति की अवधारणा का विकास एवं सेना में गोरखा एवं सिखों की नियुक्ति को प्रोत्साहन देना। 
  • तोपखाना विभाग आवश्यक रूप से ब्रिटिश अथवा यूरोपीय अधिकारी के नियंत्रण में लाया गया। 
  • भारतीय सेना में सोची-समझी नीति के तहत जाति एवं क्षेत्र के आधार पर रेजीमेंटों का गठन किया गया। 


1860 में पुलिस कमिश्नर के पद का गठन किया गया था तथा इसकी अनुशंसा पर 1861 का पुलिस एक्ट लाया गया। जिसके आधार पर पुलिस सेवा में कुछ आवश्यक सुधार किए गए। 



वित्तीय चरण के दौरान ब्रिटिशों की आर्थिक नीतियां 

1. कृषि क्षेत्र 

A. भू-राजस्व का अत्यधिक दवाब जारी 

ब्रिटिश क्राउन के अंतर्गत भी भू-राजस्व का पुराना प्रबंधन यथा स्थायी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी बंदोबस्त/व्यवस्था जारी रहा। स्थायी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी बंदोबस्त के बारे में अधिक जानने के लिए आप इस लेख को पढ़ सकते है - स्थायी, महालवाड़ी तथा रैयतवाड़ी बंदोबस्त/व्यवस्था क्या थी?


B. कृषि संबंधों का शोषण मूलक स्वरूप 

सभी प्रकार की भू-राजस्व व्यवस्थाओं में किसानों पर अत्यधिक आर्थिक दबाव था। वहीं जमींदार व महाजन लाभप्रद स्थिति में थे। स्थायी बंदोबस्त में किसानों पर सबसे अधिक दवाब था। जमींदार के द्वारा समय-समय पर मनमाने ढंग से भू-राजस्व को बढ़ा दिया जाता था। फिर आगे 1885 में रैयतवाड़ी कानून लेकर रैयतों को कुछ सुरक्षा देने का प्रयास किया गया परन्तु व्यवहार में उससे किसानों को सुरक्षा नहीं मिली। 


दूसरी ओर रैयतवाड़ी और महालवाड़ी क्षेत्र में कुछ हद तक ग्रामीण ऋणग्रस्तता एक ज्वलंत समस्या थी। अतः पहली बार कुछ इस प्रकार के कानून लाए गए जिनके माध्यम से किसानों के हाथों से महाजनों के पास भूमि के हस्तांतरण को रोकने का प्रयास किया गया। 1789 में दक्कन कृषक सहायता कानून लाया गया और 1900 में पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट लाया गया। परंतु यह समाधान व्यावहारिक नहीं था, व्यावहारिक समाधान होता - ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारणों की खोज करना। 


C. नकदी खेती का दबाव जारी 

भू-राजस्व की इतनी बड़ी रकम को चुकाने एवं महाजनी कर्ज व ब्याज की रकम को चुकाने के लिए किसान नगदी फसलों की खेती को अपनाने के लिए विवश थे, परंतु दूसरी तरफ उसका पूरा फायदा किसानों का न मिलने के कारण वे अकाल एवं ऋणग्रस्तता जैसी समस्याओं से पीड़ित थे। 


D. कृषि में अपेक्षित निवेश एवं तकनीकी सुधार में कमी 

ब्रिटिश शासन का एक दुखद पक्ष यह था कि उस कल में जब ब्रिटेन व यूरोप की कृषि तकनीकी सुधार की प्रक्रिया से गुजर रही थी वहीं भारत में इस प्रकार का तकनीकी सुधार संभव नहीं हो पा रहा था। एक तरफ सरकार एवं जमींदार कृषि में निवेश करने में रुचि नहीं ले रहे थे तो दूसरी ओर किसान निवेश करने की स्थिति में नहीं थे। 


E. अकाल की घटनाएं 

कंपनी के शासन के अंतर्गत 12 बड़े अकाल घटित हुए थे। वहीं ब्रिटिश क्राउन के शासन के अंतर्गत 10 बड़े अकाल घटित हुए। प्रत्येक अकाल में लाखों लोगों की जान चली जाती थी। 

ब्रिटिशों द्वारा उठाये गए कदम:

कंपनी की सरकार ने इस अकाल का दायित्व लेने से इनकार किया तथा उसने अकाल राहत के लिए कोई पहल नहीं की। पहली बार ब्रिटिश क्राउन के अंतर्गत इस दिशा में कुछ कदम उठाए गए। 1866 के उड़ीसा अकाल के पश्चात एक कैंपबेल समिति गठित की गई। फिर 1870 के दशक में पड़ने वाले भयंकर अकाल के पश्चात लिट्टन के शासन के अंतर्गत एक स्ट्रैची कमीशन का गठन हुआ और फिर इस कमीशन की अनुशंसा के आधार पर रिपन के काल में एक अकाल संहिता निर्मित की गई। जिसमें प्रावधान रखा गया था कि अगर तीन-चौथाई फसल नष्ट हो जाए तो सरकार भू-राजस्व की राशि माफ कर देंगी। परंतु व्यवहार में यह रियायत प्राप्त करने के लिए किसानों को अत्यधिक संघर्ष करना होता था। आगे गांधी जी ने यही रियायत पाने के लिए गुजरात के खेड़ा में 1918 में एक आंदोलन चलाया। 


2. उधोग क्षेत्र 

जैसा कि हमने पिछले लेखों में देखा कि ब्रिटिश मुक्त व्यापार की नीति का एक स्वाभाविक परिणाम रहा था भारतीय दस्तकारी का पतन अर्थात विऔद्योगिकरण। एक तरफ भारत में दस्तकारी उद्योगों का विनाश हो रहा था तो दूसरी और ब्रिटिश इसकी क्षतिपूर्ति के लिए आधुनिक उद्योगों की स्थापना में रुचि नहीं ले रहे थे। 


परंतु 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ भारतीय उधमियों ने अपनी पहल पर आधुनिक उद्योगों की स्थापना की और आगे बढ़ गए। इनमें सबसे पहले आगे बढ़े मुंबई क्षेत्र में सक्रिय पारसी व्यापारी इनमें से एक कावसजी नानाभाई के द्वारा 1853 में भड़ौच में प्रथम आधुनिक सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना की गई। फिर देखते-देखते 19वीं सदी के अंत तक पश्चिम भारत के एक बड़े क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग फैल गए और फिर आगे उत्तर भारत में भी स्थापित होने लगे। शीघ्र ही यह ब्रिटेन के सूती वस्त्र उत्पादकों को चुनौती देने लगे। उसी प्रकार कुछ ब्रिटिश उधमियों ने जूट उद्योग स्थापित करने की दिशा में कदम उठाया और इस प्रकार का पहला उद्योग बंगाल के रिसरा नामक स्थान पर स्थापित हुआ। 


भारतीय औद्योगीकरण के मार्ग में बधाएँ - 

  • भारत में औद्योगीकरण की दिशा में स्वतंत्र वातावरण मौजूद नहीं था, जो यूरोपीय देशों एवं USA को मिला था। 
  • भारत में औद्योगीकरण के लिए मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव था। 
  • पूंजीगत उद्योगों की कमी। 
  • प्रशिक्षित मानव श्रम की कमी। 
  • बैंकिंग एवं मैनेजिंग एजेंसी का समर्थन मौजूद नहीं था। 
  • ब्रिटिश प्रतिस्पर्धा के विरुद्ध भारतीय उद्योगों को संरक्षण प्राप्त नहीं था



3. यातायात एवं संचार 

इस काल में रेलवे निर्माण को विशेष रूप से प्रोत्साहन मिला साथ ही टेलीग्राफ लाइन विकसित किए गए। आधुनिक यातायात एवं संचार व्यवस्था का दोहरा लाभ ब्रिटिश को प्राप्त हो रहा था। एक तरफ भारत के बाजार का एकीकरण हो रहा था तो दूसरी और ब्रिटिश पूंजीपतियों को पूंजी निवेश करने का अवसर मिला था। 


4. बैंकिंग बीमा एवं मैनेजिंग एजेंसियां

भारतीय बाजार पर ब्रिटिश बैंकिंग बीमा आदि का नियंत्रण था। ब्रिटिश एवं यूरोपीय लोगों का अपना चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स था। ये सभी चाय, कॉफी बागान, जहाजरानी उद्योग आदि को सहायता देते थे जबकि भारतीय उद्योग और पूंजीपतियों से दूरी बनाए रखते थे। परंतु जब धीरे-धीरे भारतीय पूंजीपतियों की सक्रियता बढ़ने लगी तब उन्होंने अपना अलग से चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स बनाना शुरू किया। 


5. धन की निकासी 

ब्रिटिशों के द्वारा धन की निकासी बंगाल विजय के साथ ही आरंभ हो गई थी। परन्तु उसने बदलती हुई परिस्थितियों के साथ अपना स्वरूप बदल लिया। 

  • धन की निकासी का सबसे आरंभिक चरण उपनिवेशवाद के वाणिज्यिक चरण में देखा गया, जब बंगाल से प्राप्त राजस्व की रकम से भारतीय वस्तुओं को ख़रीदकर इन वस्तुओं को ब्रिटेन भेजा जा रहा था। इस प्रकार भारतीयों से प्राप्त धन से भारतीय वस्तुओं को ख़रीदा गया और उन्हें देश से बाहर भेज दिया गया। 


  • 1813 के बाद इसके स्वरूप में परिवर्तन आ गया था। 1813 के चार्टर में ब्रिटिश कंपनी का व्यापारिक खाता व राजस्व खाता ये दोनों एक-दूसरे से अलग कर दिए गए। अब धन की निकासी का स्वरूप भी बदल गया, अब ब्रिटिश कंपनी बड़ी मात्रा में कच्चे माल का संग्रह कर उसे भारत से बाहर निर्यात करके मुनाफा कमाने लगी। यही समय है जब नील, कपास और अफीम जैसे उत्पाद बड़ी मात्रा में निर्यात किये जा रहे थे। 


19वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक भारत से ब्रिटेन की ओर भारी मात्रा में रकम का भी हस्तानांतरण होने लगा। यद्धपि पूर्वकाल की तरह कच्चे माल का भी निर्यात जारी रहा। 1857 के पश्चात ब्रिटेन से बड़ी मात्रा में पूंजी का भारत आगमन हुआ और यह पूंजी 2 रूपों में आ रही थी -

  • चाय, कॉफी, जूट के बागानों, जहाजरानी उधोग, खनन, बैंकिंग, बीमा आदि क्षेत्रों में निवेश के रूप में। 
  • कर्ज के रूप में 


निवेश के रूप में ब्रिटेन से भारत आई पूंजी मुनाफे के साथ ब्रिटेन की ओर लौटी तथा कर्ज के रूप में आई पूंजी को प्रतिवर्ष भारत सरकार द्वारा ब्याज के साथ ब्रिटेन हस्तांतरित किया गया। 



वित्तीय चरण की सामाजिक नीतियां 

1857 के महाविद्रोह से सबक लेकर ब्रिटिश ने भारत के सामाजिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप की नीति को अपना लिया। भारत के सामाजिक क्षेत्र में सुधार करने की तत्परता लगभग समाप्त हो गई फिर अगर इस काल में ब्रिटिश के द्वारा भारत में समाज सुधार के लिए पहल की गई तो वह भारतीय राष्ट्रवादियों के दबाव में यथा बेहराम जी मालाबारी की पहल पर 1891 एज ऑफ़ कॉन्सेंट बिल (सम्मति आयु अधिनियम) लाया गया जिसके तहत लड़कियों के विवाह की आयु बढ़ाई गई। 



वित्तीय चरण की सांस्कृतिक नीतियां  

पहले ब्रिटिश उदारवादी चिंतक भारतीयों को सभ्य बनाने का दावा करते थे परंतु 1857 के महाविद्रोह के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया और वे भारतीयों को असभ्य और बर्बर चित्रित करने लगे। इस समय विक्टोरियन साइंस के द्वारा नस्लीय विभाजन को एक जैव वैज्ञानिक आधार देने का प्रयास किया गया। एक समय था जब गवर्नर जनरल की परिषद में लॉर्ड मैकाले जैसे उदारवादी सदस्य भी उपस्थित थे परंतु अब वायसराय की परिषद में जेम्स फिट्ज़ जेम्स जैसे अनुदार सदस्य को स्थापित किया गया तथा ब्रिटिश एवं भारतीयों के बीच नस्लीय विभाजन को प्रोत्साहित किया गया। 



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